Home » Uncategorized » Maa Chandraghanta ki Katha: नवरात्रि के तीसरे दिन जरूर पढ़ें मां चंद्रघंटा की कथा, पूरी होगी मनोकामना…

Maa Chandraghanta ki Katha: नवरात्रि के तीसरे दिन जरूर पढ़ें मां चंद्रघंटा की कथा, पूरी होगी मनोकामना…

Navratri Day 3 Maa Chandraghanta Puja:  नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। यह रूप शांति, साहस और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। बाघ पर सवार माँ का तेजस्वी रूप भक्तों को निर्भय बनाता है, वहीं उनका सौम्य स्वरूप शांति और सुख प्रदान करता है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप
स्वर्ण के समान चमकते शरीर वाली मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिससे इन्हें यह नाम प्राप्त हुआ। दस भुजाओं वाली देवी के हाथों में विभिन्न शस्त्र हैं और उनके गले में सफेद पुष्पों की माला रहती है। युद्ध के लिए सदा तत्पर होने पर भी इनका स्वरूप भक्तों के लिए करुणामयी और सौम्य है।

घंटे की ध्वनि से होती है रक्षा
मां के घंटे की ध्वनि से दुष्ट, दैत्य और राक्षस भयभीत रहते हैं। यही ध्वनि भक्तों को प्रेत-बाधा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है। विश्वास किया जाता है कि जैसे ही भक्त माँ का ध्यान करता है, वैसे ही यह दिव्य ध्वनि उसकी रक्षा के लिए गूंज उठती है।

नवरात्रि के तीसरे दिन की कथा: हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र की शुरुआत होती है. इस बार शारदीय नवरात्र की शुरुआत 22 सितंबर से हो चुकी है. इस उत्सव के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि घर में मां चंद्रघंटा के आगमन से सुख-शांति का आगमन होता है. चंद्रघंटा माता को स्वर की देवी भी कहा जाता है, जो सिंह पर सवार होकर असुरों और दुष्टों को दूर करती हैं. नवरात्रि के तीसरे दिन व्रती को मां चंद्रघंटा की पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने स्वर्गलोक में आतंक मचाना शुरू कर दिया और वह तीनों लोकों पर अपना अधिपत्य जमाना चाहता था. महिषासुर के बढ़ते आतंक से सभी देवता चिंतित हो गए थे और उन्होंने त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश से मदद मांगी. देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव बहुत क्रोधित हुए और उनके क्रोध से एक दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई. इस ऊर्जा से मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का जन्म हुआ, जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है. इसी वजह से उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा।

भगवान शिव ने मां चंद्रघंटा को अपना त्रिशूल भगवान विष्णु ने अपना चक्र और देवराज इंद्र ने अपना घंटा प्रदान किया. इसके बाद अन्य सभी देवताओं ने भी मां को अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दे दिए. फिर मां चंद्रघंटा महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं और माता ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ महिषासुर का वध किया, जिससे देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली.

चंद्रघंटा माता की आरती

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम।पूर्ण कीजो मेरे काम॥

चन्द्र समाज तू शीतल दाती।चन्द्र तेज किरणों में समाती॥

मन की मालक मन भाती हो।चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥

सुन्दर भाव को लाने वाली।हर संकट में बचाने वाली॥

हर बुधवार को तुझे ध्याये।श्रद्धा सहित तो विनय सुनाए॥

मूर्ति चन्द्र आकार बनाए।सन्मुख घी की ज्योत जलाएं॥

शीश झुका कहे मन की बाता।पूर्ण आस करो जगत दाता॥

कांचीपुर स्थान तुम्हारा।कर्नाटिका में मान तुम्हारा॥

नाम तेरा रटू महारानी।भक्त की रक्षा करो भवानी॥

Leave a Comment

[adsforwp id="47"]