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हिमाचल हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, बागवानी विभाग में सोसायटी के कर्मचारी होंगे नियमित

शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास सोसायटी (एचपीएचडीएस) के माध्यम से नियुक्त संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के निर्देश दिए हैं। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि सोसायटी पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है और इसके कर्मचारियों को नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह आदेश नितिन ठाकुर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य जैसे प्रमुख मामले सहित 60 से ज्यादा संयुक्त याचिकाओं पर दिया है। अदालत ने एक साझा फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए, याचिकाकर्ता राज्य के नियंत्रण में हैं और इसलिए नियमितीकरण से संबंधित लाभकारी सरकारी नीतियां उन पर भी लागू होती हैं। उन्होंने कहा कि यह कॉर्पोरेट पर्दा उठाने का एक उपयुक्त मामला है क्योंकि इस सोसाइटी का निर्माण और संचालन सरकार ने अपनी परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए किया था। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सोसायटी के माध्यम से अनुबंध पर की गई थी, फिर भी वे बागवानी निदेशालय, एचपीएमसी, कृषि विपणन बोर्ड और बागवानी विश्वविद्यालयों में कार्य कर रहे थे। न्यायाधीश ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार सोसायटी पर पूर्ण नियंत्रण रखती है, क्योंकि इसका स्वामित्व, नियंत्रण और वित्तपोषण पूरी तरह से राज्य सरकार के पास है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भर्ती विभाग की ओर से ही की गई थी और नियुक्तियों को उच्च अधिकारियों द्वारा अनुमोदित किया गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि नियमितीकरण से इन्कार करना शोषण और कृत्रिम भेदभाव के समान है। उन्होंने पहले के ऐसे मामलों का हवाला दिया जहां हिमऊर्जा, सर्व शिक्षा अभियान और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन सोसाइटी जैसी समान संस्थाओं के कर्मचारियों को समाहित किया गया था और बाद में नियमित किया गया था। प्रतिवादी सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता विश्व बैंक की ओर से वित्त पोषित परियोजनाओं के अंतर्गत कार्यरत सोसायटी के कर्मचारी हैं और उन्हें समामेलन का कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी सेवाएं परियोजनाओं के साथ ही समाप्त हो जाती हैं और उन्हें पहले के उन मामलों से अलग बताया जहां सोसायटी को सीधे राज्य द्वारा वित्त पोषित किया जाता था। इस तर्क को कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा कि इसी तरह के कर्मचारियों को अन्य मामलों के फैसलों में भी नियमित करने का आदेश दिया गया था और सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा था। न्यायालय ने 2007, 2008 और 2009 में बनाई गई सरकारी नीतियों का भी हवाला दिया, जिनमें दो साल की संविदा सेवा पूरी होने के बाद नियमितीकरण की अवधि बढ़ा दी गई थी। अदालत ने कहा कि उन्हें केवल इसलिए समानता से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें एक सोसाइटी के अंतर्गत कार्यरत दिखाया गया है। याचिकाकर्ता, हालांकि एक सोसाइटी में और वह भी एक परियोजना के लिए कार्यरत हैं, वास्तव में राज्य सरकार के कर्मचारी हैं और प्रदेश में बागवानों की बेहतरी के लिए उसकी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं।

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