राजगढ़: उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश सुरेन्द्र ठाकुर का निधन हो गया है। उनके निधन से न केवल सिरमौर जिला बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश में शोक की लहर है। न्यायपालिका और समाज में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुरेन्द्र ठाकुर का बीती रात पीजीआई चंडीगढ़ में निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और उपचार के लिए पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती थे, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। न्यायमूर्ति सुरेन्द्र ठाकुर मूल रूप से जिला सिरमौर के राजगढ़ उपमंडल की दुर्गम पंचायत मातल बखोग के निवासी थे। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने अपने परिश्रम और प्रतिभा के बल पर न्यायपालिका में एक ऊंचा मुकाम हासिल किया। पूर्व न्यायाधीश (दिवंगत) सुरेन्द्र ठाकुर का जन्म 23 सितंबर 1951 को सिरमौर के राजगढ़ में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1973 में डी.ए.वी. पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज देहरादून (मेरठ विश्वविद्यालय) से कानून की डिग्री प्राप्त की। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय और जिला अदालतों में सिविल, क्रिमिनल और राजस्व मामलों में वकालत की। अपने अनुभव और काबिलियत के दम पर उन्हें जनवरी 1990 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर चयनित किया गया। न्यायिक सेवा के दौरान उन्होंने धर्मशाला, कुल्लू, नाहन और सोलन में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में सेवाएं दीं। इसके अलावा वे जिला एवं सत्र न्यायाधीश (वन) शिमला के पद पर भी रहे। बाद में उन्होंने हमीरपुर, मंडी और सोलन जिलों में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में भी अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं। वर्ष फरवरी 1997 में उन्हें हिमाचल प्रदेश सरकार में लीगल रिमेंबरांसर-कम-सचिव (कानून) नियुक्त किया गया और वे मई 1999 तक इस पद पर रहे। इसके बाद वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रार (विजिलेंस) के पद पर भी कार्यरत रहे। बाद में उन्हें फिर से लीगल रिमेंबरांसर-कम-सेक्रेटरी (लॉ) के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने मोटर व्हीकल एक्ट के तहत अपीलीय परिवहन प्राधिकरण और कॉपीराइट बोर्ड ऑफ इंडिया की अपीलीय प्राधिकरण के सदस्य के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। वर्ष जून 2005 में उन्हें हिमाचल प्रदेश सरकार में लीगल रिमेंबरांसर-कम-प्रिंसिपल सेक्रेटरी (लॉ) बनाया गया। इसके बाद 27 नवंबर 2006 को उन्हें हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वो अपने शांत स्वभाव, न्यायप्रियता और प्रशासनिक दक्षता के लिए जाने जाते थे। उनके निधन से न्यायपालिका और समाज को एक बड़ी क्षति पहुंची है।





