
शिमला: हिमाचल की राजधानी शिमला से करीब 30 किलोमीटर दूर धामी के हलोग में पत्थरों का एक अनोखा मेला लगता है. सदियों से मनाए जा रहे इस मेले को पत्थर का मेला या खेल कहा जाता है. दीपावली से दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस मेले में दो समुदायों के बीच पत्थरों की जमकर बरसात होती है. जिसका नमूना आज भी धामी में देखने को मिला. जहाँ दोंनो तरफ से पथ्थरों की जमकर बरसात हुई. ये सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक कि एक पक्ष लहूलुहान नही हो गया. वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में सैंकड़ो की संख्या में लोग धामी मैदान में शामिल हुए. नरबलि से शुरू हुई परंपरा पशु बलि के बाद पत्थरों के खूनी खेल तक सिमटी है। इस खेल को देखने के लिए हलोग में हजारों लोग एकत्रित हुए। मंगलवार को लोगों ने एक-दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए। दो समुदायों के लोगों के बीच करीब 25 मिनट तक पत्थरबाजी होती रही। इसके बाद 60 वर्षीय धामी के रिटायर SHO सुभाष को एक पत्थर हाथ पर लगा, जिससे उनके खून निकला। फिर इन्हीं के खून से मां भद्रकाली के चबूतरे पर तिलक लगाया गया। शिमला से करीब 30 किलोमीटर दूर धामी गांव में हर साल दिवाली के दूसरे दिन 2 अलग-अलग परगना (एरिया) के लोग एक-दूसरे पर पत्थरों की बरसात करते हैं। यह सिलसिला तब तक चलता है, जब तक किसी पक्ष के किसी एक व्यक्ति का रक्त नहीं निकल जाता।
4 प्वाइंट में समझे कैसे और कब से चली आ रही यह परंपरा
- मानव बलि रोकने के लिए सती हुई रानी: यह प्रथा कब शुरू हुई, किसने शुरू की, इस बारे में आज कोई नहीं जानता। क्षेत्र के लोगों के अनुसार, ‘धामी राज परिवार की एक रानी थीं, जो कि शारड़ा चौराहे (जहां आज चबूतरा है) पर सती हो गई थीं। रानी इस बात से आहत रहती थीं कि मां भद्रकाली को नर बलि दी जाती है।
- राज परिवार पर संकट न आए, इसलिए निभाई जा रही परंपरा: उस जमाने में इलाके में सुख-शांति और राज परिवार के सुनहरे भविष्य के लिए नर बलि देने का रिवाज था। रानी इसके सख्त खिलाफ थीं। रानी तब तक राजमाता बन चुकी थीं। राजमाता का कहना था कि नर बलि की जगह भैंस की बलि दी जाए। राजा ने राजमाता की बात मान ली।
- भैंस की बलि बंद करके शुरू हुआ पत्थर मेला: मां भद्रकाली को भैंस की बलि दी जाने लगी, लेकिन क्षेत्र में आपदा आई और शाही परिवार पर कई खतरे भी आते रहे। राजमाता से निवेदन किया गया कि हमें भैंस की बलि देनी बंद कर नर बलि देना फिर से शुरू करना होगा। इस बात पर राजमाता नहीं मानीं।
- बीच का रास्ता निकालकर पत्थरबाजी शुरू: इसके बाद, बीच का रास्ता निकाला गया कि एक ऐसा खेल करवाया जाए, जिसमें दोनों तरफ अलग-अलग समुदाय के लोग हों। एक राजा की तरफ से हो और दूसरा भी उसी राजपूत वंश से हो। दोनों ही समुदाय के लोग एक दूसरे को पत्थर मारेंगे। पत्थर लगने से जिस व्यक्ति का खून निकलेगा, उसके खून से राजा मां भद्रकाली का तिलक करेगा। इस प्रकार से नर बलि से भी बचा जा सकता है और इलाके व राजवंश में सुख-शांति भी बनी रहेगी। तब से लोग एक-दूसरे पर पत्थरबाजी करते हैं। धामी में राज परिवार की तरफ से तुनड़ू, जठौती और कटेड़ू परिवार की टोली और दूसरी ओर से जमोगी खानदान की टोली के सदस्य पत्थर बरसाते हैं। अन्य लोग पत्थर मेले को देख सकते हैं, लेकिन वे पत्थर नहीं मार सकते। खेल में चौराज गांव में बने सती स्मारक के एक तरफ से जमोगी और दूसरी तरफ से कटेड़ू खानदान के लोग पथराव करते हैं। मेले की शुरुआत राज परिवार के नरसिंह के पूजन के साथ होती है।
सदियों से चली आ रही परंपरा
पत्थर मारकर किसी को घायल करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज के विज्ञान के युग में भी लोग इसका बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। इसमें क्षेत्र के सैकड़ों लोग शामिल होते हैं और दूर-दूर से भी लोग इसे देखने धामी पहुंचते हैं।





