



लाइव हिमाचल/शिमला: हिमाचल प्रदेश की स्थिति भगवान भरोसे है. आर्थिक संकट से उबरने के लिए सुक्खू सरकार ने मंदिरों से पैसा मांगा है. हिमाचल सरकार ने ‘मुख्यमंत्री सुख शिक्षा योजना’ और ‘सुखाश्रय योजना’ के लिए मंदिरों को मिलने वाले चढ़ावे से धन की मांग की है. इस बाबत सीएम सुक्खू ने राज्य सरकार के अंडर आने वाले सभी मंदिरों और उनको संभाल रहे स्थानीय डीसी को पत्र लिखा है और चढ़ावे के पैसे में से इन दो सरकारी योजनाओं के लिए पैसे देने का आग्रह किया है. हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था इतनी खराब हो गई है कि उसके पास सरकारी कर्मचारियों को समय पर वेतन तक देने के पैसे नहीं हैं. कर्ज का बोझ इतना है कि उन्हें शौचालय टैक्स लागू करना पड़ा है. कुछ समय पहले कोर्ट ने हिमाचल भवन को जब्त करने का आदेश दिया था क्योंकि सरकार एक बिजली कंपनी को 150 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं कर पाई थी. सीएम सुक्खू खुद इस बात को स्वीकार कर रहे हैं की हिमाचल प्रदेश का पूरा खजाना खाली है. प्रदेश में लोगों को सैलरी और पेंशन में देरी हो रही है. सूत्रों के हवाले से ख़बर है कि कांग्रेस सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन से आज हिमाचल विशाल कर्ज के बोझ तले दब गया है. हालिया आंकड़ों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश का कर्ज 2018 में 47,906 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023 में 76,651 करोड़ रुपये हो गया था और 2024 तक यह आंकड़ा 86,589 करोड़ रुपये हो गया था. कर्ज की रफ्तार 1 लाख करोड़ से ज्यादा के आसपास पहुंच गई है. दरअसल, हिमाचल में कर्ज की स्थिति हमेशा से थी, लेकिन अलग-अलग सरकारें इसे अलग-अलग तरीके से मैनेज करती थीं. साल 2022 में कांग्रेस ने अपने पहले साल में 1 लाख नौकरियां और पांच साल में 5 लाख नौकरियां पैदा करने का वादा किया था. इसके साथ ही महिलाओं के लिए हर महीने 1500 रुपये, हर महीने 300 यूनिट फ्री बिजली, पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली सहित कई कल्याणकारी योजनाओं का लागू करने का वादा किया था. हालांकि, इनमें से कोई भी वादा पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है. इसके साथ ही पिछले कार्यकाल में दी जाने वाली सब्सिडी भी बंद कर दी गई है. इसके बावजूद भी स्थिति गंभीर है. सीएम सुक्खू ने प्रदेश में आर्थिक संकट के लिए बीजेपी सरकार को दोषी ठहराया. उन्होंने दावा किया कि बीजेपी के नेतृत्व वाली नीतियों, जैसे फ्री पानी और बिजली प्रदान करने से राज्य के खजाने पर 1080 करोड़ रुपये का वार्षिक बोझ बढ़ गया।