शिमला: शिमला के संजौली से भट्टाकुफर के बीच बन रही टनल परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) से कड़े सवाल पूछे हैं। जस्टिस संदीप शर्मा की बेंच ने संजौली निवासी विनीत शर्मा और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए NHAI से पूछा कि शिमला बाईपास के लिए जब पहले ही जमीन अधिग्रहित कर लगभग 600 करोड़ रुपये का मुआवजा बांटा जा चुका था और 88 परिवारों को विस्थापित किया गया था, तो सतही सड़क की मूल योजना को छोड़कर घनी आबादी वाली पहाड़ी के नीचे टनल बनाने का फैसला क्यों लिया गया? अदालत ने यह भी सवाल उठाया है कि मुआवजे के रूप में सरकारी खजाने से खर्च हुए इस 600 करोड़ रुपये की भरपाई आखिर कौन करेगा? याचिकाकर्ताओं ने अदालत में सुरक्षा मानकों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए निर्माण कार्य तुरंत रोकने की मांग की। उन्होंने बताया कि टनल के ऊपर सैकड़ों मकान बने हैं और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की रिपोर्ट के अनुसार, कब्रिस्तान व विशाल मेगा मार्ट के पास टनल और ऊपरी सतह के बीच की दूरी महज 14 मीटर है, जिससे कई घरों में दरारें आ चुकी हैं और कुछ मकानों को असुरक्षित घोषित करना पड़ा है। सुनवाई के दौरान NHAI ने अदालत को आश्वस्त किया कि सुरक्षा चिंताओं के चलते 18 सितंबर 2026 से ही निर्माण कार्य पूरी तरह बंद है और IIT रुड़की की रिपोर्ट आने तथा स्थानीय मकानों की सुरक्षा सुनिश्चित होने तक काम दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा। अदालत ने केंद्र, राज्य सरकार और NHAI को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की है।





