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भूकंप के झटकों ने फिर डराया हिमाचल, 121 साल पहले आज ही के दिन कांगड़ा में हुई थी विनाशकारी तबाही…

लाइव हिमाचल/शिमला: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला और कांगड़ा घाटी 121 साल पहले यानी 4 अप्रैल 1905 की सुबह शक्तिशाली और विनाशकारी भूकंप से दहली थी। भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 7.8 मापी गई थी। भूकंप का केंद्र कांगड़ा से लगभग 150 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में पश्चिमी हिमालय की तलहटी में धरती के नीचे 6 किलोमीटर की गहराई में मिला था। भूकंप की तरंगें हिमाचल के पहाड़ों में उस जगह से उठी थीं, जहां हिमालय की करीब 2500 किलोमीटर लंबी सीमा धंसी हुई है। ऐसी ही भूकंपीय घटना के दौरान तिब्बत के नीचे भारतीय उपमहाद्वीप धंस गया था, तब यूरेशियन प्लेट्स बनी थीं। इन्हीं प्लेट के ऊपर लंबी पर्वत श्रृंखला उभरी जिसके आधे हिस्से में तिब्बत के पठार हैं और भारत में इस पर्वत श्रृंखला के नीचे भारतीय टेक्टोनिक प्लेट्स हैं। तिब्बत के पठारों के नीचे की यूरेशियन प्लेट्स जब हिमालय के नीचे की भारतीय टेक्टोनिक प्लेट्स से टकराती हैं तो भूकंपीय तरंगें निकलती हैं। इन्हीं तरंगों ने 4 अप्रैल 1905 को हिमाचल की धरती को हिलाया। इन तरंगों का कंपन इतना तेज था कि न सिर्फ हिमाचल प्रदेश बल्कि जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों तक में भूकंप के झटके लगे। वहीं पड़ोसी राज्य होने के कारण पंजाब तक हिला।
भूकंप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, मैक्लोडगंज, धर्मशाला में तबाही मची। कसौली, बिलासपुर, चंबा तक के लोगों ने कंपन महसूस किया। जम्मू कश्मीर में घनी आबादी वाली कश्मीर घाटी में जान माल का नुकसान हुआ। उत्तराखंड के देहरादून और सहारनपुर में चीख पुकार मच गई थी। पंजाब के अमृतसर जिले में स्वर्ण मंदिर के बाईं ओर बसे रामगढ़िया बंगे के बुर्ज का शीर्ष गुंबद मलबे का ढेर बन गया था। भूकंप के झटकों ने चारों राज्यों में करीब 100000 इमारतों को ध्वस्त किया। 20000 से ज्यादा लोगों की जान ली। 53000 पालतू जानवर मारे गए थे। अकेली कश्मीर घाटी में 5 से 7 हजार लोगों की मौत हुई थी। पहाड़ी जलमार्गों को इतना नुकसान पहुंचा था कि खेत खलिहान सूखने से लाखों एकड़ में खड़ी फसल सूख गई थी। भूकंप से हुए नुकसान से उबरने के लिए सरकारों को 30 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े थे।

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