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बाघल रियासत काल से किया जा रहा सायर मेले का आयोजन, पहले होती थी झोटों की लड़ाई..आखिर क्यों लगा झोटों की लड़ाई पर प्रतिबंध…

अर्की /सोलन): राज्य स्तरीय सायर मेले का आयोजन आज 16 सितंबर से 18 सितम्बर, 2024 तक अर्की के चौगान मैदान में होगा। अर्की जनपद में हर साल अश्विन मास की संक्रांति सायर पर्व के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व बाघल क्षेत्र की प्राचीन परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इस दिन सभी लोग रक्षाबंधन के अवसर पर बहनों की बांधी राखी को उतार कर प्रात: सूर्योदय से पूर्व गांव के नजदीकी जल स्रोत में प्रवाहित कर देते हैं। जल के रूप में भगवान विष्णु की आराधना मक्की और धूप-दीप के साथ की जाती है। इसके बाद लोग बावड़ी से शुद्ध जल लेकर परिवार के सभी सदस्यों को पिलाते हैं। इसी संक्रांति से लोग नई फसल के अन्न का भंडारण और इसका इस्तेमाल करते हैं। बाघल रियासत के राजा सभाचंद के शासन काल में वर्ष 1643 से सायर मेले का आरंभ हुआ। माना जाता है कि उस समय इस मेले में झोटों की लड़ाई की परंपरा आरंभ की थी, लेकिन अब न्यायालय के आदेशों के बाद केवल झोटा पूजन ही किया जाता है। सायर आने की सूचना एक विशेष प्रकार के कीट (झिंगुर) से मिलती है। वह अपनी चीं-चीं आवाज में सायर आई सायर आई का गीत सुनाकर लोगों को सायर पर्व के बारे में अवगत करवाता है। जब सायर पर्व संपन्न हो जाता है, तो यह कीट अपनी आवाज से सायर गई, सायर गई सुनाता है। सायर जहां एक ओर हर्षोल्लास का पर्व है, वहीं दूसरी शरद ऋतु के आगमन का सूचक भी है। हिमाचल प्रदेश को देवभूमि कहा जाता है लेकिन हिमाचल को मेलों-त्योहारों का प्रदेश भी कहें तो गलत नहीं होगा क्योंकि हिमाचल में लगातार त्योहार मेले चलते रहते हैं। हिमाचल प्रदेश अपनी संस्कृति, मेलों और त्यौहारों के मामले में पहले से ही बहुत प्रसिद्ध है। पूरे साल हिमाचल प्रदेश में विभिन्न मौसमीं मेले लगाए जाते हैं। सायर मेला एक ऐसा मेला है जो हिमाचल को गर्व प्रदान करता है। अर्की सायर मेला का हर साल सितंबर माह की अश्विन संक्रांति के दिन मनाया जाता है। 

सायर मेले की खासियत

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और सोलन जिला के अर्की में सायर मेला बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह क्षेत्र का एक बेहद लोकप्रिय मेला है और इसके साथ बहुत सारी आजीविका और मौज-मस्ती लाता है। वर्षों से सायर मेले में मुख्य आकर्षणों में से एक पारंपरिक झोटों की लड़ाई थी। यहां आयोजित झोटों की लड़ाई को पूरी दृढ़ता से दर्शाया जाता था, लेकिन पिछले कई वर्षों से उच्च न्यायालय ने इस प्रतियोगिता पर प्रतिबंध लगा रखा है। यह झोटों की लड़ाई सोलन के अर्की और शिमला के मशोबरा (क्रैगनैनो) में आयोजित की जाती थी। अर्की में प्रसिद्ध झोटों की प्रतियोगिता के अलावा, सायर मेले के दौरान कई रोचक और मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यहां लोक नृत्य कार्यक्रम, संगीत प्रदर्शन, और कला के कई अन्य रूपों को प्रदर्शित किया जाता है। इस मेले में भाग लेने के लिए दूर-दूर से कलाकार शामिल होते हैं। मेले में हस्तशिल्प, मिट्टी के बरतन, वस्त्र, मिठाई आदि आदि की दुकानें भी लगाई जाती हैं। इस मेले में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक के लिए सामान उपलब्ध होता है। हर वर्ग के व्यक्ति सायर मेले में शामिल होकर इसका लुत्फ उठाते हैं। अर्की के स्थानीय लोग त्यौहार को बेहद खुशी और उत्साह के साथ मनाते हैं। सायर मेला एक ऐसा मेला है जो हिमाचल प्रदेश की उत्सव की भावना को आगे बढ़ाता है। बता दें कि अर्की और मशोबरा की झोटों की प्रतियोगिता हिमाचल भर में मशूहर थी तथा इसके इलावा झोटों की लड़ाई का आयोजन अपनी रीती रिवाजो के अनुसार पवाबो, पनेश , वायचड़ी तथा रामपुर क्योंथल में हुआ करता था। अब यह यह केवल इतिहास बन के रह गया है । स्थानीय लोगों का कहना है कि झोटों के मेले पर प्रतिबंध का असर अर्की तथा मशोबरा में आयोजित होने वाले सायर मेले में अब देखने को को मिल रहा है। लोगों की मान्यता है कि झोटों को सायर मेले के दिन लड़तें देखने मात्र से ही शनिदेव महाराज की दशा के कुप्रभावों में कमी आ जाती है।

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