शिमला: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रदेश में ठोस कचरा प्रबंधन की स्थिति की गंभीर समीक्षा करते हुए जिला प्रशासनों और स्थानीय निकायों को कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि नदियों और खड्डों के किनारे कचरा फेंकना पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है। अदालत ने सुन्नी में सतलुज नदी के तट पर स्थित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट को तत्काल दूसरी जगह स्थानांतरित करने के आदेश दिए, ताकि मानसून के दौरान नदी का जल दूषित न हो। इसके साथ ही हमीरपुर में ब्यास नदी, कुणाह खड्ड, मैहरे, सलौणी तथा चंबा में रावी नदी और करियां फॉरेस्ट बैरियर के पास हो रही अवैध डंपिंग पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए शिमला, चंबा, बिलासपुर, कांगड़ा और कुल्लू के उपायुक्तों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया है और अगली सुनवाई तक विस्तृत सुधारात्मक रिपोर्ट तलब की है। अदालत के समक्ष पेश राज्य के विभिन्न हिस्सों की रिपोर्टों में जहाँ कमियाँ उजागर हुईं, वहीं कुछ क्षेत्रों के प्रयासों की सराहना भी की गई। डीएलएसए की रिपोर्ट के आधार पर नाहन-कुमारहट्टी और देहरादून-पांवटा साहिब राष्ट्रीय राजमार्गों की नालियों में फैली गंदगी तथा नाहन के वार्ड-7 में कचरा प्रबंधन बिगड़ने से बढ़ते बंदरों के आतंक पर हाईकोर्ट ने डीसी सिरमौर से जवाब माँगा है। इसके अलावा रामपुर और जुब्बल के एमआरएफ प्लांटों में आग लगने से हुए नुकसान तथा नेरवा, चौपाल, चिड़गांव और जुब्बल में लंबित एफसीए मंजूरियों पर भी ध्यान आकर्षित किया गया। बद्दी के केंदुवाल में पुराने कचरे के निष्पादन का लक्ष्य 31 दिसंबर 2027 तय किया गया है, जिसके लिए बायोगैस प्लांट और बड़े शेड बनाए जा रहे हैं। वहीं सोलन के कंडाघाट (तंदाल) में लंबित कचरा प्लांट मामले में सिविल जज कंडाघाट को शीघ्र निपटारे के निर्देश दिए गए हैं। दूसरी ओर, हाईकोर्ट ने लाहौल-स्पीति जिला प्रशासन की पहल की सराहना की, जहाँ दिसंबर 2026 तक शत-प्रतिशत कचरा पृथक्करण का लक्ष्य रखा गया है और केलांग क्षेत्र में गीला-सूखा कचरा अलग से एकत्रित किया जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई 26 अगस्त को तय की गई है।





