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दो बहनों का पावन मिलन: आज गर्भ गृह से पालकी में सवार नगर भ्रमण पर निकलेगी मां शूलिनी…

लाइव हिमाचल/प्रतिभा शर्मा/सोलन: आस्था, विश्वास, इतिहास और अटूट परंपरा के पावन संगम के साथ आज सोलन शहर एक ऐतिहासिक पल का गवाह बनने जा रहा है। अवसर है—सोलन की अधिष्ठात्री देवी, मां शूलिनी के तीन दिवसीय राष्ट्रस्तरीय मेले का, जिसका शुभारंभ आज माता की भव्य और दिव्य शोभायात्रा के साथ होने जा रहा है। आज दोपहर ठीक दो बजे, मां शूलिनी अपनी पालकी में सवार होकर, पारंपरिक वाद्य यंत्रों, ढोल-नगाड़ों और शंखध्वनि के बीच अपनी बहन से मिलने के लिए गंज बाजार स्थित मंदिर की ओर प्रस्थान करेंगी। इस बेहद भावुक और पवित्र मिलन के पल का स्वागत करने के लिए खुद सूबे के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पुरानी कचहरी के समीप मौजूद रहेंगे, जहाँ वे माता की डोली की अगवानी करेंगे और इसी के साथ इस महापर्व की आधिकारिक शुरुआत होगी। पूरा सोलन शहर इस समय दुल्हन की तरह सजा हुआ है; हर गली, मोहल्ला और बाजार रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा रहा है, मालरोड की ठोडा कलाकृतियां निखर चुकी हैं और मंदिर परिसर को फूलों की मनमोहक मालाओं से सजाया गया है। पुरानी कचहरी पर मुख्यमंत्री द्वारा स्वागत के बाद, माता की पालकी बघाट बैंक चौक पहुंचेगी, जहां भक्तों का हुजूम उन पर पुष्प वर्षा करेगा। इसके बाद यह पावन यात्रा गंज बाजार और पुराने बस स्टैंड के पड़ावों से होते हुए, मालरोड और पुराने उपायुक्त चौक की परिक्रमा करेगी। शूलिनी कल्याणे और माता मंदिर ट्रस्ट की देखरेख में निकलने वाली इस शोभायात्रा को भव्य बनाने के लिए भगवान गणेश, कृष्ण, शिव, मां काली के तीन रूपों, अघोरी तांडव और प्रभु श्री राम की मनमोहक झांकियां शामिल की गई हैं। पहाड़ी वाद्ययंत्रों, बैग पाइपर, बैंड बाजे और विशेष ढोलियों की थाप के बीच, मां शूलिनी देर रात करीब 11 बजे अपनी बहन के पास गंज बाजार पहुंचेंगी, जहां वे अगले तीन दिनों तक विराजमान रहेंगी और आगामी रविवार को पुनः अपने मंदिर लौटेंगी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, सोलन प्राचीन काल में बघाट रियासत की राजधानी हुआ करता था और यहां के शासक मां शूलिनी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते थे। मान्यताओं के अनुसार, मां शूलिनी सात बहनों में से एक हैं और देवी दुर्गा का ही अवतार हैं, जो हाथों में शूल (त्रिशूल) धारण करती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां शूलिनी साल में एक बार अपनी छोटी बहन से मिलने गंज बाजार स्थित उनके मंदिर जाती हैं, और इसी पावन मिलन की परंपरा को सदियों से वार्षिक मेले के रूप में मनाया जाता है। पहले यह मेला बघाट रियासत के राजा और स्थानीय लोगों द्वारा अच्छी फसल व सुख-समृद्धि की कामना के लिए शुरू किया गया था, जिसने समय के साथ एक विशाल रूप ले लिया और आज इसे ‘राष्ट्रस्तरीय मां शूलिनी मेला’ के नाम से जाना जाता है। पारंपरिक पहाड़ी शैली में बना माता का यह प्राचीन मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केंद्र है, जिनका मानना है कि मां शूलिनी आज भी एक ढाल बनकर पूरे सोलन शहर की रक्षा करती हैं।

आपको बता दें कि सोलन प्राचीन काल में बघाट रियासत की राजधानी था। ‘बघाट’ शब्द ‘घाट’ या ‘बारह घाट’ (घाटियों) से मिलकर बना है। इस रियासत के शासक मां शूलिनी को अपनी कुलदेवी मानते थे और उनका दृढ़ विश्वास था कि रियासत की सुख-समृद्धि और सुरक्षा केवल माता के आशीर्वाद से ही संभव है। प्रारंभ में माता का स्थान सोलन के पास ‘जाऊनजी’ नामक गाँव में था, लेकिन बाद में बघाट के राजा ने माता के दिव्य आदेश पर वर्तमान स्थान पर पारंपरिक पहाड़ी शैली में एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इस इतिहास का सबसे जीवंत हिस्सा यहाँ का शूलिनी मेला है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां शूलिनी सात बहनें थीं, जिनमें से उनकी एक छोटी बहन गंज बाजार में निवास करती हैं। सदियों पहले राजाओं द्वारा अपनी कुलदेवी को प्रसन्न करने और अच्छी फसल की कामना के लिए एक उत्सव शुरू किया गया, जो कालान्तर में दो बहनों के मिलन के उत्सव में बदल गया। हर साल जून के महीने में मां शूलिनी तीन दिनों के लिए अपनी बहन के घर (गंज बाजार) जाती हैं। बघाट रियासत के समय से शुरू हुआ यह पारंपरिक उत्सव आज एक राष्ट्रस्तरीय मेले का रूप ले चुका है, जिसका शुभारंभ आज भी बघाट राजवंश के वंशजों की विशेष पूजा के बाद ही होता है।

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