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राज्यसभा में रहेंगे राघव या नहीं, जानिए क्या कहता है नियम

Anti Defection Law: आम आदमी पार्टी के लिए 24 अप्रैल एक बड़ा राजनीतिक झटका साबित हुआ. दरअसल एक साथ सात राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़ दी. इनमें राघव चड्ढा भी शामिल थे.  इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इन सांसदों की राज्यसभा सदस्यता रद्द हो जाएगी? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत किसी सांसद को तब आयोग ठहराया जा सकता है जब वह अपनी पार्टी की सदस्यता अपनी मर्जी से छोड़ दे या किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाए. खास बात यह है कि अपनी मर्जी से सदस्यता छोड़ने का मतलब सिर्फ इस्तीफा देना ही नहीं है, इसमें किसी विरोधी पार्टी में शामिल होना या फिर सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन करना जैसे काम भी शामिल हैं. हालांकि इस कानून में एक अहम छूट भी है. अगर किसी पार्टी के चुने हुए सदस्यों में से कम से कम दो तिहाई सदस्य एक साथ पार्टी बदलने का फैसला करते हैं तो इसे व्यक्तिगत दलबदल नहीं माना जाता है. इसके बजाय इसे संसदीय दल का विलय माना जाता है. यह उन सांसदों को अयोग्य ठहराए जाने से बचाता है। आम आदमी पार्टी का राज्यसभा में कुल 10 सांसद थे. इनमें से सात सांसदों ने पार्टी बदल ली. क्योंकि सात की संख्या 10 के दो तिहाई से ज्यादा है इस वजह से यह कदम विलय वाले प्रावधान के तहत आता है. यही वजह है कि उनकी सदस्यता सुरक्षित बनी हुई है. अगर सिर्फ कुछ ही सांसदों ने पाला बदला होता तो इसे दलबदल माना जाता. इससे उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता था. लेकिन जब कोई बड़ा समूह, दो तिहाई या फिर उससे ज्यादा एक साथ पार्टी बदलता है तो कानून इसे पार्टी के अंदर एक बदलाव यानी एक विलय के तौर पर देखता है। अगर 7 से कम सांसदों ने दलबदल किया होता तो वे दो तिहाई वाली शर्त को पूरा नहीं कर पाते. ऐसी स्थिति में हर सांसद को दलबदल विरोधी कानून के तहत व्यक्तिगत रूप से अयोग्यता की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता था

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