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Navratri 2 Day Maa Brahmacharini: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से पाएं तप, ज्ञान और मनोवांछित फल! जानें विधि, मंत्र और आरती

Chaitra Navratri Day 2, Maa Brahmacharini Vrat Katha: चैत्र नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत पूजा की जा रही है। ऐसे में नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी से संबंधित है। इस मां ब्रह्मचारिणी की विधिवत पूजा करने के साथ-साथ व्रत कथा कही जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से जीवन में धैर्य, साहस और तप की शक्ति का संचार होता है। इसके साथ ही आलस्य, क्रोध, स्वार्थ और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाएं दूर होती हैं। ऐसे में साधक को लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। अगर आप चैत्र नवरात्रि के दौरान मां ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा कर रहे हैं, तो उनके व्रत की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी की व्रत कथा…

शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मचारिणी यानी ‘ब्रह्म’ का अर्थ है तपस्या और ‘चारिणी’ का मतलब है उसका आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ – तपस्या का पालन करने वाली देवी।

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप काफी अलौकिक है। मां शांत अवस्था में तप में लीन है। तपस्या के कारण उनके मुख में तेज है। मां ने दाहिने हाथ में अक्ष माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण किया हुआ है।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा (Maa Brahmacharini Vrat Katha)

पूर्वजन्म में ब्रह्मचारिणी देवी ने पर्वतों के राजा हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था, साथ ही नारद जी के उपदेश से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं। मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

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