शिमला: हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय और राज्यीय राजमार्गों पर आवारा मवेशियों से हो रहे हादसे का मामला अब कोर्ट तक पहुंच गया हैं. शिमला हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जिसमें सरकार से जवाब मांगा गया है कि आखिर सड़कों पर घूमते मवेशियों पर रोक लगाने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता और हाईकोर्ट के वकील गणेश भरवा ने बताया कि प्रदेश की फोर लेन और नेशनल हाईवे सड़कों पर आवारा पशुओं की मौजूदगी सड़क सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है. भरवा ने अदालत के सामने यह तथ्य रखा कि हाईवे पर वाहनों की तेज गति के चलते मवेशियों से टक्कर की आशंका बनी रहती है. उन्होंने कहा कि हाल ही में एक पंजाबी गायक की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद यह मामला और गंभीर हो गया है।
9 हजार से ज्यादा गायें सड़कों पर
भरवा ने अदालत को बताया कि विभिन्न सर्वेक्षणों और रिपोर्टों के मुताबिक, हिमाचल में करीब 9,000 गायें सड़कों पर छोड़ दी गई हैं. उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ ट्रैफिक सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि यह मानवीय दृष्टिकोण से भी चिंता का विषय है. उन्होंने बताया कि इन मवेशियों की देखभाल के लिए पर्याप्त शेल्टर नहीं हैं, जिससे वे सड़कों पर घूमने को मजबूर हैं।
गोवंश कल्याण उपकर के पैसे का मांगा हिसाब
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार होटल और रेस्तरां से प्रति ग्राहक ₹10 का “गोवंश कल्याण उपकर” वसूलती है. इससे हर साल लगभग ₹100 करोड़ की राशि इकट्ठी होती है. भरवा ने कहा कि हमने कोर्ट से मांग की है कि इस पैसे का उपयोग कहाँ और कैसे हुआ, इसकी पूरी जांच की जाए. सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अब तक कितनी राशि एकत्र हुई और उसका क्या उपयोग हुआ। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस मसले पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अगर इस पर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो हिमाचल में हालात बिगड़ सकते हैं. उन्होंने पंजाब के होशियारपुर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ आवारा पशुओं द्वारा लोगों पर हमले बढ़ रहे हैं, और हिमाचल में वैसी स्थिति नहीं आनी चाहिए. कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह वित्तीय वर्ष 2023 से 2025 तक गोवंश कल्याण उपकर के तहत खर्च की गई राशि का पूरा ब्यौरा अदालत में पेश करे. साथ ही इस मामले में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।





