शिमला: हिमाचल प्रदेश के लाहौल क्षेत्र से इस वक्त की एक बेहद बड़ी और रणनीतिक खबर सामने आ रही है. सिंधु जल संधि के निलंबन के बाद केंद्र सरकार एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है. लाहौल घाटी में चंद्रा नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन की ओर मोड़ने वाली बहुचर्चित ‘चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना’ पर जल्द ही काम शुरू हो सकता है. नई दिल्ली में इस प्रोजेक्ट को लेकर हलचल बेहद तेज हो चुकी है और अब बस इसकी आधिकारिक घोषणा का इंतजार है. इस महापरियोजना के तहत कोकसर क्षेत्र में पीर पंजाल पर्वत के सीने को चीरकर करीब 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाई जाएगी, जिस पर 2,352 करोड़ रुपये की लागत आएगी. यही नहीं, पूरे प्रोजेक्ट और गाद प्रबंधन प्रणाली (Silt Management) को मिलाकर करीब 2,600 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. पानी के रुख को मोड़ने और जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए लाहौल घाटी में चंद्रा नदी पर 19 मीटर ऊंचा एक आधुनिक बैराज भी बनाने की योजना है, जिसके जरिए पानी को इस सुरंग नेटवर्क में डायवर्ट किया जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, सिंधु जल संधि (1960) के तहत पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल की अनुमति का फायदा उठाते हुए यह भारत का एक बड़ा रणनीतिक कदम है. इस हाइड्रोलिक ढांचे से पानी ब्यास बेसिन में आते ही हिमाचल प्रदेश की जलविद्युत उत्पादन क्षमता में अभूतपूर्व उछाल आएगा, जो करीब 4,000 मेगावाट तक अतिरिक्त बिजली उत्पादन का मजबूत आधार बन सकती है. हालांकि, इस संवेदनशील क्षेत्र में काम शुरू करने से पहले पर्यावरणीय और भौगोलिक पहलुओं का गहरा अध्ययन भी बेहद जरूरी होगा।





