Supreme Court News: चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 26 हफ्ते के गर्भ को गिराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए एम्स को नई रिपोर्ट सबमिट करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने एम्स को कहा कि वह देखे कि महिला और उसके गर्भ में पल रहे भ्रूण की हालत कैसी है. सुनवाई के दौरान CJI चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत का कानून तमाम देशों के कानून से बहुत आगे है. हम हमेशा बहुत आगे की सोचते हैं.
13 अक्टूबर को मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने इस बात का भी संज्ञान लिया कि याचिकाकर्ता महिला ‘पोस्टपार्टम साइकॉसिस’ से जूझ रही है और डॉक्टरों की सलाह पर दवा ले रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम का हवाला भी दिया. कहा कि भारतीय संसद ने एक कानून बनाया है. उस कानून में हर पहलुओं को परखने के बाद गर्भपात के लिए 24 हफ्ते की समय सीमा या कटऑफ तय की गई है. संसद ने बहुत सोच-समझकर और सारे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही यह कटऑफ तय की होगी. कानून में कहा गया है कि 20 हफ्ते तक के गर्भ को गिराया जा सकता है और रेयर केस में 24 हफ्ते तक अनुमति दी जा सकती है.
CJI ने दिया आयरलैंड का उदाहरण
चीफ जस्टिश चंद्रचूड़ ने कहा कि एमटीपी एक्ट में यह बात साफ लिखी गई है कि 24 हफ्ते की समय सीमा तभी पार की जा सकती है, जब मां का जीवन दांव पर लगा हो या भ्रूण असामान्य (अबनॉर्मल) हो. सीजेआई ने आयरलैंड के एक केस का उदाहरण भी दिया. कहा कि वहां अबॉर्शन पर पूरी तरह बैन है, इसलिए एक भारतीय महिला की जान चली गई. एक अबॉर्शन की अनुमति मिलती तो शायद उसकी जान बच जाती. सीजेआई ने कहा कि हमारे यहां तो इस बात पर रोक है ही नहीं. यदि मां का जीवन खतरे में है तो प्राथमिकता दी जाती है.
प्रिस्क्रिप्शन पर भी शक’
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला की तरफ से पेश एडवोकेट अमित मिश्रा ने दलील दी कि उनकी मुवक्किल लंबे समय से ‘पोस्टपार्टम साइकॉसिस’ से जूझ रही है और अक्टूबर 2022 से दवा ले रही हैं. उनके अंदर सुसाइड जैसी भावना (Suicidal Tendencie) है और अपने बच्चे को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
वकील की दलील पर चीफ जस्टिस ने कहा कि महिला के मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन से साफ नहीं होता है कि वास्तव में बीमारी क्या है. हाथ से जो प्रिस्क्रिप्शन लिखा गया है उससे कुछ साफ नहीं होता है. न तो उसमें कोई बीमारी बताई गई है. सीजेआई ने कहा कि हमें इस पर्चे पर भी शक है. क्या सिर्फ केस को प्रभावित करने के लिए सितंबर में सब तैयार किया गया? आपको भी यह चीज समझनी होगी.
क्या है पूरा मामला?
एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और अर्जी लगाई थी कि वह अपने 26 हफ्ते के गर्भ को गिराना चाहती है. 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने इसकी इजाजत भी दे दी. लेकिन अगले ही दिन जब सीजेआई चंद्रचूड़ के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने प्रक्रिया पर रोक लगा दी. एम्स के डॉक्टरों का तर्क है कि गर्भ 26 सप्ताह का है, ऐसे में भ्रूण में जीवन की संभावना है. अबॉर्शन से भ्रूण हत्या भी हो सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी नहीं मानी महिला
सीजेआई (CJI DY Chandrachud) की रोक के बाद इसी बृहस्पतिवार (12 अक्टूबर) को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने केंद्र सरकार की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी को निर्देश दिया था कि वह एक बार महिला से बात करें. प्रेगनेंसी को आगे कैरी करने के लिए मनाने का प्रयास करें. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिला कुछ हफ्ते और प्रेगनेंसी कैरी कर ले ताकि भ्रूण और स्वस्थ हो जाए. हालांकि शुक्रवार को ASG ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उन्होंने महिला को मनाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं मानी और अभी भी अपनी जिद पर अड़ी हैं.




